Saturday, December 13, 2014

बचपन


छीन लिया खुद
हमने अपने
बच्चों का बचपन,
कभी न बूझा
हमने उनका
निर्मल-अनगढ़ मन।

उगता सूरज
कभी न देखा
न देखी गोधूल,
डेढ़ बरस में
प्लेग्रुप पहुँचे
ढाई में स्कूल;

पाँच बरस में
चश्मा धारे
लगते हैं पचपन।

मेहमानों की आमद
पर तो
बन जाते शो पीस,
एक साँस में
मंत्र सुनाने
पड़ते हैं चालीस;

मम्मी-डैडी
चाहें बेटा
दिखला दे हर फ़न।

न्यूटन के
नियमों से लेकर
कोलंबस की खोज,
क्या-क्या पढ़ें
बिचारे,भारी
बस्ते का ही बोझ ;

कंप्यूटर
का गेम चाटता
है दीमक सा तन।

मम्मी- डैडी
सुबह निकलते
और लौटते शाम,
शहरी घर है
दादी-बाबा
का उसमें क्या काम;

ना वह अँगना
ना वह चंदा
ना लोरी की धुन।
- ओमप्रकाश तिवारी

(12 दिसंबर, 2014)

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