Friday, July 19, 2013

तो लिखूँ

मन को मेरे
कुछ कुरेदे
तो लिखूँ ।

भूख औरों की
मुझे
अहसास हो,
कष्ट का उनके
मुझे
आभास हो ;

दूसरों का
दर्द बेधे
तो लिखूँ ।

लोग जीते हैं
जहां
अपने लिए,
कोई जो
औरों की ख़ातिर
भी जिए ;

अपने पल दो पल
भी दे दे
तो लिखूँ ।

हार जाना
तो बहुत
आसान है,
परिस्थितियों
पर विजय का
मान है ;

दुख को
उलटे पाँव खेदे
तो लिखूँ ।

(19 जुलाई, 2013)



Monday, June 24, 2013

जल है

पर्वत से
नयनों तक
जल है।

मेघ फटे
अब
हृदय फट रहा,
बिछुड़ों
के ही
नाम रट रहा;

पुनर्मिलन को
जिया
विकल है।

मचल उठी
गंगा
की धारा,
छीना
जीवन का
उजियारा;

सब अपने
कर्मों का
फल है ।

नेत्र तीसरा
शिव ने
खोला,
शायद तभी
हिमालय
डोला ;

जो कहलाता
सदा
अचल है ।

( 24 जून, 2013)

Monday, June 10, 2013

क्या लिखोगे

बिक चुकी है
रोशनाई,
क्या लिखोगे !

रहनुमाओं
की पलक
पर है नजर,
अपने हिस्से
की मलाई
का भी डर ;

खान कोयले की
कहाँ
उजले दिखोगे !

मत गुमाँ पालो
कि हैं
अखबार में,
सोच लो
हम भी
खड़े बाजार में ;

बिक रहे हैं सब
मियाँ तुम
कब बिकोगे !

साथ में
सत्ता के
चलना है जरूरी ;
लो बना
थोड़ी सी
आदर्शों से दूरी ;

बात छोटी सी है
आखिर
कब सिखोगे !

झूठ वालों
का सफर
निद्वंद्व है,
सत्य का
हुक्का
व पानी बंद है;

तुम भला
तूफान में
कब तक टिकोगे !


(10 जून, 2013)

Thursday, June 6, 2013

सूर्य से नजरें मिलाकर

सूर्य से
नजरें मिलाकर
बात करना चाहता हूँ ।

तेज है उसका प्रबल
इस बात का
अहसास है,
तपन में
महसूस होती
जानलेवा त्रास है;

अनुसरण
सूरजमुखी का
फिर भी करना चाहता हूं ।

जानता हूँ
सात घोड़ोंवाला
रथ भी खास है,
राजपथ सा
रौंदता दिखता
वो नित आकाश है ;

भव्यता के
इस बवंडर
से उबरना चाहता हूँ ।

रश्मियों से बनी
वल्गा, हाथ में
निज थाम कर,
हौसले को
स्वयं अपने
कोटि-कोटि प्रणाम कर ;

सारथी बन
साथ उसके
मैं विचरना चाहता हूँ ।

( 06 जून, 2013)

Thursday, May 30, 2013

घूमिए भारत सफारी

घूमिए
भारत सफारी ।

देखिए
महलों में रहते
दीमकों के ढेर हैं,
मूषकों की
बिल में दुबके
बैठे बब्बर शेर हैं;

घास खाकर
सो रही है,
सिंहनी घायल बेचारी ।

गिरगिटों की
हर प्रजाति
भी यहां मौजूद है,
घर बया का
बंदरों ने
किया नेस्तनाबूद है;

बाघ-चीते
कर रहे हैं
सियारों के घर बेगारी ।

दोमुँहे
साँपों की बस्ती
भी यहां आबाद है,
गर्दभों के
राग पर मिलती
हमेशा दाद है;

कोयलों के
सुर पे कौवों की
हुई अब तान भारी ।

लाल फीतों में बंधे
कितने ही
ऐरावत खड़े,
शुतुरमुर्गों
के यहां पर
शीश दिखते हैं गड़े;

लोमड़ी ने
राजरानी
की गजब पोशाक धारी ।


(30 मई, 2013)


Saturday, May 18, 2013

खिड़कियाँ खोलो

खिड़कियाँ खोलो
हवा
ताजी मिलेगी ।

बंद दरवाजे
सभी
दीवार ऊँची,
एक कमरा
बन गया
दुनिया समूची;

इस घुटन में
जिंदगी
कैसे चलेगी ।

है सुखद
अनुभूति
दरिया की रवानी,
रुक गया तो
शीघ्र
सड़ जाता है पानी;

कुमुदिनी
निर्मल
सरोवर में खिलेगी।

मुस्कराओ
तुम
दिखाओ गर्मजोशी,
अजनबी भी
हो अगर
अपना पड़ोसी;

बर्फ तो कुछ
प्रेम
पाकर ही गलेगी ।

(18 मई, 2013)

Wednesday, May 8, 2013

मूल्य बिकते

मूल्य बिकते
कींमतों के
चढ़ रहे बाजार में ।

लोग बौने हैं
मगर
लंबी हुईं परछाइयाँ,
हैं शिखर पर
किंतु चारों ओर
दिखतीं खाइंयाँ ।

कल तलक
आदर्श थे जो,
आज कारागार में ।

है लगी
कीमत सभी की
बोल का भी मोल है,
जो बिके
वो ही खबर है
और सब बेमोल है ।

इश्तेहारों में
दबी, दिखती
खबर अखबार में ।

विश्व के
एकीकरण का
स्वप्न सब पाले हुए,
भाइयों के साथ
भोजन
की रसम टाले हुए ।

जल रहे हैं
चार चूल्हे,
एक ही परिवार में ।

ईद, होली
व दशहरा
या कि दीवाली रहे,
गले मिलना दूर
अब तो
जुबाँ भी खाली रहे ।

उँगलियों से
एक एसएमएस
भेजते त्यौहार में ।

(9 मई, 2013)