Thursday, April 9, 2026

बस कथा विद्धंस की

बस कथा विद्ध्वंस की

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लोग लिखने पर तुले हैं
बस कथा
विद्ध्वंस की।

कौन इस कलिकाल में
निकले सृजन का
गीत गाने,
चल पड़े कुछ लोग अब तो
‘सभ्यता’
को ही मिटाने ;

फिक्र हम करते नहीं अब
तनिक आगत
वंश की।

किस हवा में सांस लें अब
हर तरफ
बारूद है,
मौत की आहट
कदम दर कदम
पर मौजूद है ;

सृष्टि चट कर
गिद्ध भी अब
चाल चलता हंस की।

बाहुबल भारी पड़े
हर ओर
सह अस्तित्व पर,
विजय ध्वज
फहरा रहे
इंसानियत की मृत्यु पर ;

गूंजती हैं अट्ठहासें
आज
रावण-कंस की।

- ओमप्रकाश तिवारी

Friday, August 8, 2025

धरा बन जाती 'धराली'


खोल देते जब अचानक
शिव जटा से गंग धारा,
धरा बन जाती 'धराली'
है न दिखता कुछ सहारा।

दृश्य यह दिखता है प्रतिदिन
हम प्रकृति की चीर खींचें,
देखकर भी साफ दुर्गति,
हम पड़े हैं आंख मींचे ;

जाएगी किस ओर नदिया
घेर हम बैठे किनारा। 

काट कर वृक्षों को हमने ही
किया पर्वत को नंगा,
कब तलक आंचल को फटते
मूक बन देखेगी गंगा ;

शंख यह प्रतिशोध का
फूंका गया कुदरत के द्वारा।

था बुजुर्गों ने सिखाया
प्रकृति की हम करें पूजा,
किंतु हमने आधुनिक बन
चुन लिया है मार्ग दूजा ;

जान लो इस राह पर
चलकर न होना है गुजारा।

- ओमप्रकाश तिवारी

08 अगस्त, 2025

Tuesday, July 15, 2025

हे भगीरथ माफ करना !

ॐ 
.....
हे भगीरथ माफ करना।

जानता हूँ 
आप ही गंगा को 
धरती पर उतारे,
स्वयं के संग 
अनगिनत पुरखों को
हम सबके भी तारे,
किंतु अब तो
आग देने की भी
फुर्सत ना बची है,
कौन गंगा तीर जाकर
अस्थियां
पुरखों की वारे।

इसलिए तो
पड़ रहा अब
स्वयं गंगा को ही मरना।

सच कहूं तो
आज तक वह 
तप तुम्हारा याद है,
गूँजती कानों में
शिव से आपकी
फरियाद है,
याद है वह गूँजती
गोमुख से
हर हर हर ध्वनी,
और फिर
सुजलाम होती
यह धरा भी याद है।

किंतु नाले 
गिर रहे गंगा में बनकर
आज झरना।

तीर पर 
गंगा के दादी माँ
ने जा पियरी चढ़ाई,
लोकगीतों में सुनी
गंगा की 
हरदम ही बड़ाई ;
अब न दादी हैं
न है वह लोक
उनका ही रचा,
प्लास्टिक की थैलियां
गंगा पे करतीं
अब चढ़ाई।

भूल बैठा आज तो
इंसान पापों
से भी डरना।

- ओमप्रकाश तिवारी
00:52/ 08 जुलाई 2025

Sunday, August 13, 2023

अपनी माटी


चमक-दमक में
महानगर के
याद आ रही अपनी माटी।

दरक-दरक कर
बरखा - दर - बरखा
धसकीं घर की दीवारें,

जब शहरों में
संकट छाया
वे दीवारें, रोज पुकारें ;

याद आ रही
बिकी खतौनी
थी जो भाई के संग बाँटी।

लॉक हुआ जब
महानगर, अरु
हाथ लगी नौकरिया बिछड़ी,

नगर निगम
अहसान जताकर
बाँट रहा है सूखी खिचड़ी ;

हाथ-पाँव यदि
वहाँ चलाते
अपनी माटी हमें खिलाती।

भले दिनों में
बहुत भले हैं
नगर सभी को खूब लुभाएँ,

लेकिन यह भी
परम सत्य है
शहरों की अपनी सीमाएं ;

पुनः आसरा
देगी अब तो
टूटी - दरकी माँ की छाती
 
- ओमप्रकाश तिवारी
(19 मई, 2020)

(मई का तीसरा सप्ताह शुरू होते-होते मुंबई में मेरे कई साथी और जानने वाले अस्पताल पहुँच चुके थे। एक-दो निकट परिचित विद्युत शवदाहगृह की भेंट चढ़ चुके हैं। अब बिल्डिंगों में रहने वाले कई रिश्तेदारों और मित्रों को भी अपने गाँव की याद सताने लगी है। तब फूटीं ये पंक्तियां )


स्वेद की गंगा

हाइवे पर 

बह रही है

स्वेद की गंगा ।

दिख रहे हैं
काफिले दर काफिले
हर ओर,
रात लंबी है बहुत
दिखती न
इसकी भोर ;

राह आधी 
भी हुई ना
भर गई जंघा ।

आज 
मेहनतकश श्रमिक गण
बन गए फुटबॉल,
जा रहे चलते
न कोई
पूछता है हाल ;

हर व्यवस्थादार
अब तो
दिख रहा नंगा।

गिर चुकीं
लाशें कई
कोई चले भूखा,
है सुरक्षित
गाँव अपना
रोटला रूखा ;

पुनः लौटेंगे
रहा यदि
सब भला-चंगा।

- ओमप्रकाश तिवारी
(14 मई, 2020)

(मई का प्रथम सप्ताह बीतते-बीतते महानगरों से श्रमिकों के पलायन की खबरें आने लगी थीं। मुंबई - नासिक हाइवे पैदल चलते श्रमिकों से पट गया था। तब 14 मई को लिखा गया यह नवगीत )


मेरे दिल का हाल


तुम्हें मुबारक
राशन-पानी
पका पकाया माल,

तुम क्या जानो
कोठी वालों
मेरे दिल का हाल !

हम अटके हैं
महानगर में
घर में सब परिवार,
मात-पिता का 
पूत अकेला
मैं ही जिम्मेदार ;

होगा कौन सहाय
यहाँ पर
यदि आ जाए काल !

नरक सरीखी
इक खोली में
बारह जन का वास,
बाहर निकलो
डंडे खाओ
घर में जिंदा लाश ;

फारिग होना भी
बस्ती में
अब तो हुआ मुहाल !

महुआ चूने लगा
गांव में
आने लगे टिकोर,
भूखे-प्यासे
हम परदेसी
बैठे हैं इस ओर ;

पछुआ में पक
बाट जोहती
है गेहूँ की बाल !

- ओमप्रकाश तिवारी
(14 अप्रैल, 2020)

(14 अप्रैल तक समाज के एक वर्ग द्वारा यह तर्क दिए जाने लगे थे कि महानगरों में अटके श्रमिकों को भरपूर भोजन मुहैया कराया जा रहा है। फिर वे क्यों अपने घर जाने को उतावले हो रहे हैं ! तब श्रमिकों की मनःस्थिति को दर्शाते इस नवगीत की रचना होती है)


लॉक डाउन

माना कि 

मन में कुछ डर है,
लेकिन धरती - आसमान में
दिखता कुछ तो
अति सुंदर है।

सुबह-सुबह 
कोयल की कू - कू
महानगर में अचरज सी थी,
सच कहता हूँ
बालकनी में
आकर गौरैया बैठी थी;

बीचोबीच 
शहर में जैसे
मेरे बचपन वाला घर है।

नदिया का जल
साफ हो गया
वायु प्रदूषण हाफ हो गया,
दुर्घटना में
मरने वालों 
का भी बेहतर ग्राफ़ हो गया;

स्याह दिखाई
देता था जो,
दिखता वह नीला अम्बर है।

सुबह रही ना
हड़बड़ वाली,
चलते-चलते वाली थाली,
बैठ पिता-माता
के संग अब
पीते गरम चाय की प्याली;

बेटे के घर में
रहने से,
भ्रम होता वह गया सुधर है।

- ओमप्रकाश तिवारी
( 6 अप्रैल, 2020 )

(लॉक डाउन के 12 दिन गुजरते ही जालंधर से हिमालय पर्वत दिखाई देने, दिल्ली में यमुना के साफ हो जाने और मुंबई में तेंदुए के सड़क पर घूमने की खबरें आने लगीं, तो 6 अप्रैल को यह नवगीत बना था। )