Thursday, May 30, 2013

घूमिए भारत सफारी

घूमिए
भारत सफारी ।

देखिए
महलों में रहते
दीमकों के ढेर हैं,
मूषकों की
बिल में दुबके
बैठे बब्बर शेर हैं;

घास खाकर
सो रही है,
सिंहनी घायल बेचारी ।

गिरगिटों की
हर प्रजाति
भी यहां मौजूद है,
घर बया का
बंदरों ने
किया नेस्तनाबूद है;

बाघ-चीते
कर रहे हैं
सियारों के घर बेगारी ।

दोमुँहे
साँपों की बस्ती
भी यहां आबाद है,
गर्दभों के
राग पर मिलती
हमेशा दाद है;

कोयलों के
सुर पे कौवों की
हुई अब तान भारी ।

लाल फीतों में बंधे
कितने ही
ऐरावत खड़े,
शुतुरमुर्गों
के यहां पर
शीश दिखते हैं गड़े;

लोमड़ी ने
राजरानी
की गजब पोशाक धारी ।


(30 मई, 2013)


Saturday, May 18, 2013

खिड़कियाँ खोलो

खिड़कियाँ खोलो
हवा
ताजी मिलेगी ।

बंद दरवाजे
सभी
दीवार ऊँची,
एक कमरा
बन गया
दुनिया समूची;

इस घुटन में
जिंदगी
कैसे चलेगी ।

है सुखद
अनुभूति
दरिया की रवानी,
रुक गया तो
शीघ्र
सड़ जाता है पानी;

कुमुदिनी
निर्मल
सरोवर में खिलेगी।

मुस्कराओ
तुम
दिखाओ गर्मजोशी,
अजनबी भी
हो अगर
अपना पड़ोसी;

बर्फ तो कुछ
प्रेम
पाकर ही गलेगी ।

(18 मई, 2013)

Wednesday, May 8, 2013

मूल्य बिकते

मूल्य बिकते
कींमतों के
चढ़ रहे बाजार में ।

लोग बौने हैं
मगर
लंबी हुईं परछाइयाँ,
हैं शिखर पर
किंतु चारों ओर
दिखतीं खाइंयाँ ।

कल तलक
आदर्श थे जो,
आज कारागार में ।

है लगी
कीमत सभी की
बोल का भी मोल है,
जो बिके
वो ही खबर है
और सब बेमोल है ।

इश्तेहारों में
दबी, दिखती
खबर अखबार में ।

विश्व के
एकीकरण का
स्वप्न सब पाले हुए,
भाइयों के साथ
भोजन
की रसम टाले हुए ।

जल रहे हैं
चार चूल्हे,
एक ही परिवार में ।

ईद, होली
व दशहरा
या कि दीवाली रहे,
गले मिलना दूर
अब तो
जुबाँ भी खाली रहे ।

उँगलियों से
एक एसएमएस
भेजते त्यौहार में ।

(9 मई, 2013)

Wednesday, April 24, 2013

कहां जिंदगी वश में

चौदह रुपए वड़ा पाव के
चाय हो गई दस में,
कहां जिंदगी वश में !

राशनकार्ड कई रंगों के
उलझे ताने-बाने,
बैठ शिखर पर तय होते हैं
गुरबत के पैमाने ;

देश दिखे, जैसा दिखलाएं
आकाओं के चश्मे !

अनुदानों की सूची लंबी
हुआ खजाना खाली,
अर्थव्यवस्था के माहिर भी
बजा रहे हैं थाली ;

सौ दिन में सुख देनेवाली
धूल खा रही कस्में !

संसद में लड़ते-भिड़ते सब
पीछे मिले हुए हैं,
होंठ सभी के जनता के
प्रश्नों पर सिले हुए हैं ;

नारा, वोट, चुनाव आदि सब
लोकतंत्र की रस्में !

(25 अप्रैल, 2013)

Wednesday, April 10, 2013

बाबू जी की एक तर्जनी

बाबू जी की
एक तर्जनी
कितना बड़ा सहारा थी ।

मेले-ठेले में जाना हो
या हो नुक्कड़ का बाजार,
सड़क अमीनाबाद सरीखी
हो जाती थी क्षण में पार;

उंगली पकड़े रहते
जब तक,
अपनी तो पौ बारा थी ।

स्वर-व्यंजन पहचान कराना
या फिर गिनती और पहाड़े,
उंगली कभी रही न पीछे
गरमी पड़ती हो या जाड़े;

चूक पढ़ाई में
होती तो,
उंगली चढ़ता पारा थी ।

कम्प्यूटर का युग ना था वो
बाबू गणक कहां से लाएं,
उंगली पर ही कर लेते थे
दफ्तर की सारी गणनाएं;

उंगली
सिर्फ नहीं थी उंगली,
घर का वही गुजारा थी ।

(11 अप्रैल, 2013)

Monday, April 8, 2013

ख़तरनाक हैं दुश्मन से

ख़तरनाक हैं
दुश्मन से, जो
अंदर-अंदर चाल रहे ।

सीमा पर के
तोप - मिसाइल, वाले
दुश्मन भले सही,
खंजर लेकर
वो हाथों में, मिलते हैं
ना गले सही ;

किंतु यहाँ तो
मुँह में मिसरी
लेकिन टेढी चाल रहे ।

हाथ मिलाना
गले लगाना
मीठी-मीठी बात करें,
सत्ता की
चाभी मिल जाए
तो सारे मिल घात करें;

फाड़ो गला
लगाओ नारे
उनकी मोटी खाल रहे ।

एक गया
दूजा आएगा
परिवर्तन की आस नहीं,
यहां कुएं में
भाँग मिली है
किसी को होश-हवास नहीं;

दशा-दिशा
कैसे सुधरेगी
जब उल्लू हर डाल रहे ।

( 09 अप्रैल, 2013)

Wednesday, March 20, 2013

होलिके स्वागत तुम्हारा

होलिके
स्वागत तुम्हारा !

हिरण्यकश्यपु
की व्यवस्था
आज भी आबाद है,
हाथ जोड़े
आस में, प्रभु की
खड़ा प्रह्लाद है ;

आजमा लो
बल तुम्हारा !

अब तेरे
स्नान ख़ातिर
हर तरफ ही आग है,
किंतु
तेरी चूनरी में
एक छल का दाग है ;

सोच लो
आगत दुबारा !

आज भी
भाई-भतीजावाद
की भरमार है,
झूठ-सच में
एक चुनना
पर तेरा अधिकार है ;

क्या नहीं
काफी इशारा !

(21 मार्च, 2013)