Tuesday, December 11, 2018

सपनों की दुनिया

अपने सपनों की
दुनिया इतनी छोटी है,
सिर पर छत एक, और
दाल-भात-रोटी है।

बस इतना चाह रहे
मेहनत का मोल मिले,
बच्चों का मुरझाया चेहरा
ज्यों फूल खिले ;

किंतु आस इतनी भी
पूर्ण नहीं होती है।

तुम आकर पांच बरस
में देते आश्वासन,
पर जुमला बन जाता
जाते ही वह भाषण ;

जाने क्यों बंधु लगे
नीयत ही खोटी है।

हमने कब चाँद और
तारों की माँग करी,
कब छप्पन भोग और
कब माँगा सूप-करी ;

वादों में तुमने ही
बाँटी तो बोटी है।
- ओमप्रकाश तिवारी
(08 दिसंबर, 2018)

नया हिंदुस्तान

यह सदी इक्कीसवीं का
नया हिंदुस्तान है।

दो में गेहूँ
तीन में चावल
हुआ इफरात है,
और
मनरेगा बदौलत
शाम भी 'आबाद' है ;

अब खुदा के ओहदे पर
जमा ग्राम प्रधान है।

नौजवाँ को चाहिए
बस नौकरी
सरकार की,
फिक्र
वेतन से अधिक है
ऊपरी दो-चार की ;

घाघ से बिल्कुल उलट
अब सोचता इंसान है।

है महानगरों में
बिगड़ी
और भी दिखती दशा,
घुन बना
है खा रहा अब
नौनिहालों को नशा ;

ये चलन ही देश का
सबसे बड़ा नुकसान है।
- ओमप्रकाश तिवारी
(06 दिसंबर, 2018)

Thursday, December 6, 2018

बॉस

तुम सही हो
ये सही है,
किंतु मेरी बात मानो।

फायदा क्या 
इस तरह 
तनकर खड़े रहकर भला,
काटने पर 
क्यों तुले हो
स्वयं बच्चों का गला ;

बॉस वो है
नाकि तुम हो,
बस अटल यह सत्य जानो।

रीढ़ की हड्डी
झुका लो
और घुटने टेक दो,
काम आएगा
न एफडी
अहं का, अब फेंक दो ;

नौकरी है दोस्त 
समझो,
और मत अब रार ठानो। 

खुश रहोगे यार
बस यह 
सूत्र अपनाओ जरा,
कल सुबह 
लेकर मिठाई 
घर पे दे आओ जरा ;

रोज चखकर 
टिफ़िन उसका,
स्वाद सब्जी का बखानो। 

- ओमप्रकाश तिवारी
(6 दिसंबर, 2018)

ड्रामा

इस ड्रामे का
प्रथम नियम है,
इसमें पर्दा नहीं खुलेगा।
दर्शकगण
नाचें-गाएंगे
चिल्लाएंगे-झल्लाएंगे,
ज्यादा से ज्यादा
क्या होगा ?
कुर्सी पर से उठ जाएंगे !
किंतु देखना
नाट्यगार से
कोई बंदा नहीं हिलेगा।
रोचकता से
भरा हुआ है,
दर्शकमंडल डरा हुआ है,
चरमबिंदु पर
पता चल रहा
सूत्रधार तो मरा हुआ है ;
जिसको नायक
मान लिया वह,
सबको छाती ठोंक छलेगा।
जिस पर्दे को
देख रहे हो,
उसके पीछे ही है ड्रामा,
कोई है
'कुलीन' अभिमन्यु
तो कोई है शकुनी मामा ;
'लोक' द्रौपदी को
इस युग में
सखा कृष्ण अब नहीं मिलेगा।
- ओमप्रकाश तिवारी
( 6 दिसंबर, 2018)

Sunday, December 2, 2018

बड़े लोग

बड़े लोग हैं
बड़ा अलहदा
उनके घर का तौर-तरीका।
हर कमरे में
इक टीवी है
देखे, जिसको जो पसंद हो,
कोई न खटकाए
साँकल
चार दिनों से भले बंद हो ;
जाना बेटे के
कमरे में
माना जाता नहीं सलीका।
इंतजार
पूरे कुनबे का
करती रहती डाइनिंग टेबल,
मिलते हैं
बस मुँह लटकाए
उस पर दादी-दादा केवल ;
त्यौहारों
में भी रह जाता
स्वाद व्यंजनों का है फीका।
शाम ढले
बेटा जाता है
बेटी लौटे रात गए,
सब अपनी
मर्जी के मालिक
किसको क्या माँ-बाप कहे ;
प्रगतिशील
दुनिया है ये ही
कौन करे इस पर अब टीका।
- ओमप्रकाश तिवारी
(02 दिसंबर, 2018)

Tuesday, October 16, 2018

माफ करना कौस्तुभ

ॐ
.....
माफ करना कौस्तुभ
जब दुश्मनों से तुम लड़े थे !

काम में उलझा रहा मैं
व्यस्त था वह दिन हमारा,
था जुलूसों का बवंडर
गगनभेदी एक नारा;
गोलियों से क्रूर अरि की
लाल जब तुम हो रहे थे,
'लाल' हमने भी किया था
उस दिवस ये शहर सारा।

जानते हो मित्र ! हम उस रोज
आरक्षण की खातिर,
टेंट में तपती दुपहरी
एक अनशन में पड़े थे !

जल रहा था शहर, मानो
हो धरा अंगार पर,
है कुठाराघात होता
आजकल 'अधिकार' पर ;
क्या पता तुम सैनिकों को
देश के हालात का,
कट रही है जिंदगी
यूँ जान लो, बस धार पर।

चार ही दिन तो हुए
यूनिवर्सिटी के प्रांगण में
'जंग-ए-आजादी' का परचम
लेके हम भी तो खड़े थे !

मर गए जिस देश की खातिर
भगत-आजाद-बिस्मिल,
जोड़ने की फिक्र में घुलते रहे
सरदार तिल-तिल ;
मित्र, ऊपर से दिखाई 
दे रहा है एक लेकिन,
जुड़ न पाया आज तक भी
सैकड़ों टुकड़ों बँटा दिल ।

फिक्र जब तुम कर रहे थे
शत्रु के आघात की,
जात की चिंता लिए हम
आंदोलन पर अड़े थे।

  • ओमप्रकाश तिवारी
(15 अक्टूबर, 2018)



(समुद्र मंथन के दौरान निकला 5वां रत्न था कौस्तुभ मणि। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते थे। देश की ऐसी ही अमूल्य मणि थे मुंबई के निकट मीरारोड निवासी मेजर कौस्तुभ राणे, जो अगस्त, 2018 में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए। नवगीत में उनके नाम का उपयोग एक प्रतीक के तौर पर सीमा पर तैनात और निरंतर शहीद हो रहे वीर सैनिकों के रूप में किया गया है। )

गाँधी

ऊँ
.....
याद तो हर मोड़ पर
तुम आज भी
आते हो गाँधी।

याद है 'हे राम' कहकर
अचानक
दुनिया से जाना,
प्रार्थना में 'रामधुन' ही
हर सुबह
औ शाम गाना ;

नाम यह लेने पे उठती
आज तो 
हर ओर आँधी।

सत्य के प्रति
था अटल
मासूम सा आग्रह तुम्हारा,
था इसी हथियार से
तुमने 
फिरंगी को पछाड़ा ;

आज कर्कश
लग रही है
सत्य की वो ही मुनादी।

सूत-चरखा
औ रुई संग
नाचती हाथों से तकली,
अब विदेशी ब्रांड पर
फैली हुई
मुस्कान नकली ;

आज 
सत्ता की गली में
गालियाँ खाती है खादी।

लीडरों की फौज
मरती
दिख रही है वोट पर,
और बापू 
तुम बचे हो
आज केवल नोट पर ;

है उसी तस्वीर का
अब हो चुका
यह देश आदी।

- ओमप्रकाश तिवारी

(बापू की 149वीं जयंती 2 अक्टूबर, 2018 को रचा गया नवगीत)