Thursday, December 6, 2018

ड्रामा

इस ड्रामे का
प्रथम नियम है,
इसमें पर्दा नहीं खुलेगा।
दर्शकगण
नाचें-गाएंगे
चिल्लाएंगे-झल्लाएंगे,
ज्यादा से ज्यादा
क्या होगा ?
कुर्सी पर से उठ जाएंगे !
किंतु देखना
नाट्यगार से
कोई बंदा नहीं हिलेगा।
रोचकता से
भरा हुआ है,
दर्शकमंडल डरा हुआ है,
चरमबिंदु पर
पता चल रहा
सूत्रधार तो मरा हुआ है ;
जिसको नायक
मान लिया वह,
सबको छाती ठोंक छलेगा।
जिस पर्दे को
देख रहे हो,
उसके पीछे ही है ड्रामा,
कोई है
'कुलीन' अभिमन्यु
तो कोई है शकुनी मामा ;
'लोक' द्रौपदी को
इस युग में
सखा कृष्ण अब नहीं मिलेगा।
- ओमप्रकाश तिवारी
( 6 दिसंबर, 2018)

Sunday, December 2, 2018

बड़े लोग

बड़े लोग हैं
बड़ा अलहदा
उनके घर का तौर-तरीका।
हर कमरे में
इक टीवी है
देखे, जिसको जो पसंद हो,
कोई न खटकाए
साँकल
चार दिनों से भले बंद हो ;
जाना बेटे के
कमरे में
माना जाता नहीं सलीका।
इंतजार
पूरे कुनबे का
करती रहती डाइनिंग टेबल,
मिलते हैं
बस मुँह लटकाए
उस पर दादी-दादा केवल ;
त्यौहारों
में भी रह जाता
स्वाद व्यंजनों का है फीका।
शाम ढले
बेटा जाता है
बेटी लौटे रात गए,
सब अपनी
मर्जी के मालिक
किसको क्या माँ-बाप कहे ;
प्रगतिशील
दुनिया है ये ही
कौन करे इस पर अब टीका।
- ओमप्रकाश तिवारी
(02 दिसंबर, 2018)

Tuesday, October 16, 2018

माफ करना कौस्तुभ

ॐ
.....
माफ करना कौस्तुभ
जब दुश्मनों से तुम लड़े थे !

काम में उलझा रहा मैं
व्यस्त था वह दिन हमारा,
था जुलूसों का बवंडर
गगनभेदी एक नारा;
गोलियों से क्रूर अरि की
लाल जब तुम हो रहे थे,
'लाल' हमने भी किया था
उस दिवस ये शहर सारा।

जानते हो मित्र ! हम उस रोज
आरक्षण की खातिर,
टेंट में तपती दुपहरी
एक अनशन में पड़े थे !

जल रहा था शहर, मानो
हो धरा अंगार पर,
है कुठाराघात होता
आजकल 'अधिकार' पर ;
क्या पता तुम सैनिकों को
देश के हालात का,
कट रही है जिंदगी
यूँ जान लो, बस धार पर।

चार ही दिन तो हुए
यूनिवर्सिटी के प्रांगण में
'जंग-ए-आजादी' का परचम
लेके हम भी तो खड़े थे !

मर गए जिस देश की खातिर
भगत-आजाद-बिस्मिल,
जोड़ने की फिक्र में घुलते रहे
सरदार तिल-तिल ;
मित्र, ऊपर से दिखाई 
दे रहा है एक लेकिन,
जुड़ न पाया आज तक भी
सैकड़ों टुकड़ों बँटा दिल ।

फिक्र जब तुम कर रहे थे
शत्रु के आघात की,
जात की चिंता लिए हम
आंदोलन पर अड़े थे।

  • ओमप्रकाश तिवारी
(15 अक्टूबर, 2018)



(समुद्र मंथन के दौरान निकला 5वां रत्न था कौस्तुभ मणि। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते थे। देश की ऐसी ही अमूल्य मणि थे मुंबई के निकट मीरारोड निवासी मेजर कौस्तुभ राणे, जो अगस्त, 2018 में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए। नवगीत में उनके नाम का उपयोग एक प्रतीक के तौर पर सीमा पर तैनात और निरंतर शहीद हो रहे वीर सैनिकों के रूप में किया गया है। )

गाँधी

ऊँ
.....
याद तो हर मोड़ पर
तुम आज भी
आते हो गाँधी।

याद है 'हे राम' कहकर
अचानक
दुनिया से जाना,
प्रार्थना में 'रामधुन' ही
हर सुबह
औ शाम गाना ;

नाम यह लेने पे उठती
आज तो 
हर ओर आँधी।

सत्य के प्रति
था अटल
मासूम सा आग्रह तुम्हारा,
था इसी हथियार से
तुमने 
फिरंगी को पछाड़ा ;

आज कर्कश
लग रही है
सत्य की वो ही मुनादी।

सूत-चरखा
औ रुई संग
नाचती हाथों से तकली,
अब विदेशी ब्रांड पर
फैली हुई
मुस्कान नकली ;

आज 
सत्ता की गली में
गालियाँ खाती है खादी।

लीडरों की फौज
मरती
दिख रही है वोट पर,
और बापू 
तुम बचे हो
आज केवल नोट पर ;

है उसी तस्वीर का
अब हो चुका
यह देश आदी।

- ओमप्रकाश तिवारी

(बापू की 149वीं जयंती 2 अक्टूबर, 2018 को रचा गया नवगीत)

Saturday, September 15, 2018

कुछ दिनों पहले

ऊँ
.....
कुछ दिनों पहले
अभी बस
कुछ दिनों पहले

पान की दूकान पर
कुछ चल रही थी बात,
था विषय यूँ ही कोई
बस आज के हालात ;
कट लिए मुझसे हमारे
रोज के साथी,
जान बैठे जब अचानक
वो हमारी जात !

कुछ दिनों पहले
अभी बस
कुछ दिनों पहले

जश्न के माहौल में था
वह बगल का घर,
उस पड़ोसी को मिला था
कोर्ट का फेवर ;
हम जिन्हें समझा किये
हैं सिर्फ 'दो लड़के'
था उन्हीं में
एक बेगम-दूसरा शौहर !

कुछ दिनों पहले
अभी बस
कुछ दिनों पहले
गार्डेन में रोज मिलकर
मुस्कुराता था,
हाय-हैल्लो बोलकर बस
गुजर जाता था ;
खाल में खरगोश की
निकला लकड़बग्घा,
जो किसी कॉलेज में
'कुछ तो' पढ़ाता था !

- ओमप्रकाश तिवारी
(14 सितंबर, 2018)

Wednesday, September 12, 2018

संबंध

जंग लग रहा संबंधों में
झाड़ो-पोछो
पुनः जिलाओ।

माँ से बात हुए कितने दिन
बीत गए
कुछ याद नहीं,
छोटा भाई क्या करता है
यही बड़े को
ज्ञात नहीं ;

कम से कम रविवार सुबह तो
इन अपनों को
फ़ोन मिलाओ।

स्कूलों के दिन भी क्या थे
याद कीजिए
वह साथी,
इंटरवल में जिसका डिब्बा
क्लास छीनकर
थी खाती ;

अच्छा हो, इक रोज बुलाकर
गप्प मारो
कुछ खिलाओ।

रोज पाक को गाली देते
नीति देश की
कोस रहे,
बगल फ्लैट में कौन रह रहा
नहीं किसी को
होश रहे ;

कभी पड़ोसी को 'बेमतलब'
किसी शाम तो
चाय पिलाओ।

- ओमप्रकाश तिवारी 

Saturday, September 8, 2018

मकड़ी

बुन रही है जाल
कुछ जंजाल
फिर मकड़ी।

रहे लापरवाह हम
था घर पड़ा गंदा,
मिल गया मौका उसे
चालू किया धंधा ;

साफ दिखता
वो बुनाई
कर रही तगड़ी।

छाप कर बैठी दिखे
हर ओर का कोना,
लग रहा अब तो निरर्थक
स्वयं का होना ;
 
है निडर-निर्भीक
सदैव
ही दिखे अकड़ी।

नींद गायब हो गई
भयभीत हूँ हरदम,
है दिवस में भी यहां
महसूस होता तम;

जाल उसका
जान मेरी
लग रही जकड़ी।

- ओमप्रकाश तिवारी