Saturday, September 8, 2018

मकड़ी

बुन रही है जाल
कुछ जंजाल
फिर मकड़ी।

रहे लापरवाह हम
था घर पड़ा गंदा,
मिल गया मौका उसे
चालू किया धंधा ;

साफ दिखता
वो बुनाई
कर रही तगड़ी।

छाप कर बैठी दिखे
हर ओर का कोना,
लग रहा अब तो निरर्थक
स्वयं का होना ;
 
है निडर-निर्भीक
सदैव
ही दिखे अकड़ी।

नींद गायब हो गई
भयभीत हूँ हरदम,
है दिवस में भी यहां
महसूस होता तम;

जाल उसका
जान मेरी
लग रही जकड़ी।

- ओमप्रकाश तिवारी

Sunday, August 26, 2018

विकास

बना गाँव में रोड
रोड ने
कैसा अजब विकास किया !

खेत गए जिस-जिसके उसको
रुपए कई करोड़ मिले,
अब घर-घर में कार, और
मोटरसाइकिल की होड़ मिले;
पहले थी चौपाल, बुजुर्गों का
अड्डा-हुक्का-पानी,
अब जमती फड़ ताश-जुए की
रिश्ते-नाते गौड़ मिलें;

चौराहे पर आ
'ठेके' ने
सबकुछ सत्यानाश किया।

एक कुआँ था, जिसपर लगती
देखी चरखी की बारी,
बिना कहे हर व्यक्ति निभाता था
आकर अपनी बारी;
चना-चबैना-चटनी-सिखरन
की मचती थी लूट वहाँ,
गुड़ से भी मीठी लगती थी
बड़के बाबा की गारी;

ट्यूबवेल ने
सहकार खत्म कर
धरती का भी नाश किया।

खंभे गड़े गाँव में आकर
तो सबने खाए लड्डू,
अब तो जब तक रहती बिजली
दिन में भी जलते लट्टू;
बिजली आई, टीवी आया
शुरू बहस का दौर हुआ,
आग लगाकर मजा लूटते
हैं अब भाड़े के टट्टू;

आए मियाँ 'विकास'
मगर भाईचारे का
ह्रास किया।

- ओमप्रकाश तिवारी

(26 अगस्त, 2018) 

परती खेत

अबकी गांव गया तो
फैले देखे
परती खेत।
दूर-दूर तक मंजर दिखता
जैसे चारागाह,
दरवाजे पर बूढ़े दादा
भरते ठंढी आह;
सोच रहे
पुरखों की धरती
हो ना जाए रेत।
बड़का छोड़ जमींदारी
है बन बैठा दरवान,
छुटका धनादेश की मस्ती
में भूला पहचान;
फाल बिना हल
करमन रोए, औ
कुदाल बिन बेंट।
सावन-भादों बीता जाए
कहीं न दिखता धान,
दाने-दाने को तरसेगा
अबकी तो खलिहान;
सोचो-सोचो
दुनिया कैसे
भर पाएगी पेट।
- ओमप्रकाश तिवारी
(23 जुलाई, 2018) 

Sunday, June 3, 2018

विक्रम तू उत्तर दे

विक्रम तू उत्तर दे
सोचकर सवाल के,
वरना फिर जाएगा
बेतलवा डाल पे।
माना तू वीर बहुत
छप्पन का सीना है,
लेकिन क्या लाभ अगर
विष हमको पीना है;
अनुदानों की सूची
लेकर हम चाटें क्या ?
महंगाई के थप्पड़
पड़ते जब गाल पे !
माना तेरी खातिर
बातें ये छोटी हैं,
पर अपनी उम्मीदें
दाल-भात-रोटी हैं;
गणतंत्री मेहमानों
से उनको क्या लेना,
श्रम सीकर मोती से
हों जिनके भाल पे।
माना कि कागज़ पर
खेपें हैं सपनों की,
लेकिन कुछ ऊंची हैं
उम्मीदें अपनों की;
ग़र तेरी वंशी की
मोहकता कम होगी,
तो परजा नाचेगी
औरों की ताल पे ।
- ओमप्रकाश तिवारी

तटस्थ

सच बोलूँ !
जो ऋजुविहीन हैं
जुबाँहीन हैं
वे तटस्थ हैं!!


सूर्योदय से सूर्य अस्त तक
दिखती है बस
रोजी-रोटी,
नाम पड़ोसी का ना जानें
दुनिया इनकी
इतनी छोटी;

सिर्फ पेट की
चिंता में ही
बेचारे हो गए
पस्त हैं।

है बड़ा मुश्किल
हमेशा, सत्य का ही
साथ देना,
जान जोखिम में फंसाकर
डूबते को
हाथ देना ;

इसलिए
रहते वो
ऊहापोह में ही
त्रस्त हैं।

स्वहित रहे दुनिया से ऊपर
इस पर आँच
न आने पाए,
अपनी चर्बी रहे सलामत
चाहे देश
भाड़ में जाए;

बीवी से टीवी
तक फैले
अखिल विश्व में
आप मस्त हैं।

सच्चाई से आँख मूँदना
शायद है इनकी
मजबूरी,
ज्ञान बहुत है बघारने को
पर विवाद से
रखते दूरी ;

निर्णय की
स्थिति आने पर
बेचारे खाते
शिकस्त हैं।

स्वार्थसिद्धि जिस ओर
महाशय को देखा
झुकते उस बाजू,
सुविधा के अनुसार मियाँ का
झुक जाता है
सदा तराजू ;

वतनपरस्ती
के चोले में
ये जनाब बस
धन-परस्त हैं।
- ओमप्रकाश तिवारी

Friday, February 9, 2018

दशा कही ना जाय

एक तिहाई दूध बह गया
खाकर आज उबाल,
और पतीली की पेंदी में
चिपक गई है दाल ;

सूझे नहीं उपाय
समस्या नई-नई है।

सुबह दस बजे भोर हुई, औ
रात दस बजे शाम,
बित्ते भर के घर में दिखता
आज काम ही काम ;

मिली न ढंग की चाय
हेकड़ी निकल गई है।

बस पानी पी विदा ले चुके
कितने ही मेहमान,
कोस रहे हैं भूखे-प्यासे
घर बैठे भगवान ;

बिन दाने के आज
चिरैया लौट गई हैं।

सूर्य-चंद्र चल रहे यथावत्
ना आया भूचाल,
फिर भी बिगड़ी-बिगड़ी लगती
ग्रह-नक्षत्र की चाल ;

दशा कही ना जाय
घरैतिन गाँव गई हैं।

- ओमप्रकाश तिवारी

Monday, January 29, 2018

धर्मा

रुख्सत होते जाएं
धर्मा जैसे कई किसान,
किंतु न टेढ़ी होने पाए
राजा जी की शान।

सत्ता बदले, नेता बदले
हो राहत का शोर,
किंतु न बदले अखबारों में
मौतों का स्कोर;

राज किसी का आए-जाए
स्थिति रहे समान।

जाने कब अधिग्रहण सूचना
दे निकाल सरकार,
फीता ले पटवारी आए
दे दे गहरी मार;

स्वेद बहाए जो धरती पर
उसकी सस्ती जान।

इधर कर्ज का बोझ चढ़ा है
उधर न मिलते भाव,
बेटी बढ़ती जाय कुँआरी
हँसता सारा गाँव;

माँ समझा मिट्टी को, उसमें
मिले आज अरमान।

- ओमप्रकाश तिवारी