Sunday, October 4, 2015

माँ तुम ऐसा रूप धरो


दुर्गे
दुर्गा शक्ति बनो तुम
मन बनना इंद्राणी।
बेशक, हम सबको भाती है
नई चेतना सारी,
नहीं चाहते आधी दुनिया
रहे सदा बेचारी ;
बनो
इंदिरा, विजयलक्ष्मी
या झाँसी की रानी ।
अष्टभुजी बहुशस्त्र सजी
कर रक्तिम खप्परवाली,
दानव के सीने पर हो पग
क्रोधमयी माँ काली ;
सनी लियोनी
जैसी प्रतिमा 
मत गढ़ना कल्याणी।
माँ तुम ऐसा रूप धरो
ना नजरें हों शर्मिंदा,
ध्वज भी तेरा फर-फर फहरे
मर्यादा हो जिंदा ;
श्रद्धा
उपजे, नहीं वासना में
डूबा हो प्राणी।
- ओमप्रकाश तिवारी

Saturday, July 4, 2015

एक प्रार्थना

ऊँ
....
एक प्रार्थना
................
हे प्रभू वह मति प्रसारो
सब करें कल्याण सबका।

करि कृपा सारे जगत को
दीजिए वह चेतना,
कर सकें महसूस हम सब
हर किसी की वेदना;
प्रेम का विस्तार हो
इस स्वार्थी संसार में,
दो मनुष्यों बीच
किंचित मात्र भी हो भेद ना।
हाथ इक – दूजे का थामे
साथ हो उत्थान सबका।
देश का शासन – प्रशासन
रहनुमा – नेता सभी,
बुद्धिजीवी-कवि-विचारक
और अध्येता सभी;
बुद्धि निर्मल हो सभी की
शुद्ध चिंतन में लगें,
मत भटकने दीजिए
इस वर्ग की नीयत कभी।
हों अहं से दूर सारे
सब करें सम्मान सबका।
याद हो आठों प्रहर
हर पल हमें कर्तव्य अपना,
फिर भले संघर्ष की
ज्वाला में क्यों ना पड़े तपना;
हम कमर कस कर खड़े हों
हौसला नभ को छुए,
राष्ट्र को स्वर्णिम बनाने का
करें हम पूर्ण सपना।
हर स्वचिंतन बीच हो प्रभु
देश पर भी ध्यान सबका।
- ओमप्रकाश तिवारी

Tuesday, June 30, 2015

गिरी बोरवेल में रेहाना


ऊँ
--
गिरी बोरवेल
में रेहाना !

गड्ढा है पतला व गहरा,
वहां नहीं था कोई पहरा;
खेल रही थी नन्हीं बच्ची
गई उसी गड्ढे में भहरा ।

है अपनी पूरी तैयारी
चार कैमरेवाली गाड़ी
टीवी छोड़
कहीं मत जाना !

सुस्ती पुलिस फोर्स पर छाई,
एनडीआरएफ देर से आई;
बोरिंग मालिक की कर दी है
ग्रामीणों ने खूब पिटाई।

अपनी भी कुछ है मजबूरी
अब सचमुच है बहुत जरूरी
कॉमर्शियल ब्रेक
दिखलाना !

दुआ निकालो दिल से सच्ची,
ख़तरे में है प्यारी बच्ची;
सिमपैथी में सेंध लगाना
बहुत बड़ी है माथापच्ची।

लगा रहे ग़र गिरना-पड़ना
बढ़ती दर्शकगण की गणना
चहिए खाली
एक बहाना !
- ओमप्रकाश तिवारी

Monday, June 22, 2015

पितृ दिवस

ऊँ
....
सुबह अचानक 
बेटे ने जब
छुए हमारे पावं।
नयन तरल हो उठे
द्रवित था हृदय
रुद्ध आवाज,
सोच रहा था
पश्चिम से क्यों
सूरज निकला आज;
मन में सोचा
खेल रहा है
पैसे के हित दावं।
ना होली-ना दीवाली
ना और
कोई त्यौहार,
जन्मदिवस
में बाकी इसके
अभी महीने चार;
फिर कैसे
इस जेठ दुपहरी
दिखी बादली छावं।
तभी चाय की
चुस्की के संग
जब पलटा अखबार,
'पितृ दिवस' की
कुछ ख़बरों से
नयन हुए दो-चार;
तब समझा
नवपीढ़ी की है
सही दिशा में नाव।
- ओमप्रकाश तिवारी

Friday, June 19, 2015

चाहें बेला फूल


जीवन भर हम
रहे रोपते
केवल वृक्ष बबूल,
प्रत्युत्तर में
तो भी चाहें
सुंदर बेला फूल।

पौ फटने से
रात ढले तक
निजता ही निजता,
सिर्फ स्वचिंतन
में ही जीवन
जाता है छिजता ;

अपने से
बाहर की दुनिया
जाते हैं हम भूल।

सदा अहं को
पाला-पोसा
ना छोड़ा अभिमान,
अपनी सुविधा
के आगे, ना रहा
और कुछ ध्यान ;

प्रतिफल में
एकाकीपन
यूँ चुभता जैसे शूल।

गहन ईर्ष्या
की ज्वाला से
जब-जब धधके मन,
जलें पड़ोसी बाद
सुलगता
पहले निज कण-कण ;

फिर भी
समझ नहीं पाते हम
अपने दुःख का मूल।

- ओमप्रकाश तिवारी

Sunday, April 26, 2015

क्यों न फटे धरा की छाती

क्यों न फटे धरा की छाती,
छलके सागर, गिरें पहाड़ ।
दुःशासन की भाँति
धरा की चीर खींचते
हम न लजाए,
वृक्ष बुजुर्गों ने
जो पोसेे
सारे हमने काट गिराए;
किस करनी पर प्रकृति करेगी
बोलो-बोलो हमसे लाड़ !
भूल गए हम
कृष्ण सखा संग
गोवर्द्धन पूजन की गाथा,
फैशन सा
बन गया रौंदना
रोज-रोज अब सागरमाथा;
मस्त हुआ जाता है मानुष
एवरेस्ट पर झंडे गाड़।
रोका नहीं
यहाँ भी हमने,
अपना विश्वविजय का घोड़ा,
बाँध दिए तटबंध
नदी को
जैसा चाहा, वैसा मोड़ा;
देखो-देखो हमने बीघों
रत्नाकर को दिया पछाड़।
- ओमप्रकाश तिवारी

Wednesday, April 1, 2015

मूर्ति फिर खंडित हुई

हो गई फिर
मूर्ति खंडित
आस्था से जो गढ़ी थी।
हम तो पहले से ही
ठगहारों के
मेले में खड़े थे,
स्वर्ग दिखलाने को
जीते जी
स्वयं तुम ही अड़े थे;
बात में भी
चाशनी की
इक परत मोटी चढ़ी थी।
तुम कुम्हारों
की कमी
दुनिया को समझाते रहे,
दूध चन्दन
के कटोरे
में ही गरमाते रहे;
काठ की हाँडी
बताओ
कब - कहाँ पहले चढ़ी थी।
समझते हैं खेल
कुछ जन
छोड़ना बातों का सोशा,
दुःख अपरिमित
किंतु देता
टूटता है जब भरोसा;
किन उमीदों
पर चढ़ाऊँ
जो लता पहले चढ़ी थी।
- ओमप्रकाश तिवारी