Friday, June 19, 2015

चाहें बेला फूल


जीवन भर हम
रहे रोपते
केवल वृक्ष बबूल,
प्रत्युत्तर में
तो भी चाहें
सुंदर बेला फूल।

पौ फटने से
रात ढले तक
निजता ही निजता,
सिर्फ स्वचिंतन
में ही जीवन
जाता है छिजता ;

अपने से
बाहर की दुनिया
जाते हैं हम भूल।

सदा अहं को
पाला-पोसा
ना छोड़ा अभिमान,
अपनी सुविधा
के आगे, ना रहा
और कुछ ध्यान ;

प्रतिफल में
एकाकीपन
यूँ चुभता जैसे शूल।

गहन ईर्ष्या
की ज्वाला से
जब-जब धधके मन,
जलें पड़ोसी बाद
सुलगता
पहले निज कण-कण ;

फिर भी
समझ नहीं पाते हम
अपने दुःख का मूल।

- ओमप्रकाश तिवारी

Sunday, April 26, 2015

क्यों न फटे धरा की छाती

क्यों न फटे धरा की छाती,
छलके सागर, गिरें पहाड़ ।
दुःशासन की भाँति
धरा की चीर खींचते
हम न लजाए,
वृक्ष बुजुर्गों ने
जो पोसेे
सारे हमने काट गिराए;
किस करनी पर प्रकृति करेगी
बोलो-बोलो हमसे लाड़ !
भूल गए हम
कृष्ण सखा संग
गोवर्द्धन पूजन की गाथा,
फैशन सा
बन गया रौंदना
रोज-रोज अब सागरमाथा;
मस्त हुआ जाता है मानुष
एवरेस्ट पर झंडे गाड़।
रोका नहीं
यहाँ भी हमने,
अपना विश्वविजय का घोड़ा,
बाँध दिए तटबंध
नदी को
जैसा चाहा, वैसा मोड़ा;
देखो-देखो हमने बीघों
रत्नाकर को दिया पछाड़।
- ओमप्रकाश तिवारी

Wednesday, April 1, 2015

मूर्ति फिर खंडित हुई

हो गई फिर
मूर्ति खंडित
आस्था से जो गढ़ी थी।
हम तो पहले से ही
ठगहारों के
मेले में खड़े थे,
स्वर्ग दिखलाने को
जीते जी
स्वयं तुम ही अड़े थे;
बात में भी
चाशनी की
इक परत मोटी चढ़ी थी।
तुम कुम्हारों
की कमी
दुनिया को समझाते रहे,
दूध चन्दन
के कटोरे
में ही गरमाते रहे;
काठ की हाँडी
बताओ
कब - कहाँ पहले चढ़ी थी।
समझते हैं खेल
कुछ जन
छोड़ना बातों का सोशा,
दुःख अपरिमित
किंतु देता
टूटता है जब भरोसा;
किन उमीदों
पर चढ़ाऊँ
जो लता पहले चढ़ी थी।
- ओमप्रकाश तिवारी

Thursday, March 12, 2015

योगमाया

योगमाया 
आज कंसों से
जरा बचकर दिखाओ !

कृष्ण की
लेकर जगह, उनको
तुम्हीं ने था बचाया,
वास्तव में 
धर्म भगिनी का
बखूबी था निभाया;

भ्रूणहंताओं के 
हाथों से भी
अब तुम पार पाओ ।

जानकी बन
दिवस कितने
कलश में तुमने बिताए,
गांधारी बन
कई जन्मों के 
कर्जे भी चुकाए;

अब जरा 
नौ माह, माँ के 
गर्भ में रहकर बताओ। 

था बहुत आसान
शायद
रक्तबीजों से निपटना,
बाँधकर शिशु पीठ
दोनों हाथ 
अंग्रेजों से लड़ना;

निर्दयी परिवार से
तुम लड़ सको
तो पुनः आओ। 

- ओमप्रकाश तिवारी

जिसका कुर्ता सबसे उज्जर ......

जिसका कुर्ता सबसे उज्जर
पोतो उसे घसीट कर ।
अँगनाई में पानी-पानी
भौजाई ने कीचड़ सानी
बूढ़ा बैठीं मुँह लटकाए
पर बुढ़ऊ में दिखे जवानी
लौंडे मुँह में रंग लगाए
थोड़ी-मोड़ी भंग चढ़ाए
खेल रहे हैं जमकर होली
चढ़े भैंस की पीठ पर ।
लगीं सुबह से अम्मा-काकी
कोई व्यंजन रहे न बाकी
घर वाले खाएं ना खाएं
देनी पड़ती बहुत खुराकी
हफ्ते भर से तैयारी है
गुंझिया-पापड़ की बारी है
आज सुबह से चढ़ी कड़ाही
पूड़ी छने अँगीठ पर ।
काका गाएं सरर कबीरा
सबके मुँह पर पोत अबीरा
दरवाजे पर गुड़ की भेली
उसके बाद पान का बीरा
बने जेठ भी सारे देवर
घूँघट भी दिखलाए तेवर
जब से होली जली रात को
देवी जी के डीठ पर ।
- ओमप्रकाश तिवारी

Wednesday, January 14, 2015

कांपती काया का घर

काँपती काया का घर
...........................
तीन मंजिल
आठ कमरे
कांपती काया का घर,
खेलते
डॉलर में बच्चे
और हम हैं दर-ब-दर।

बैंक में
बैलेंस काफी
पेंशन भी कम नहीं,
है दिया
भगवान का सब
सच में कोई गम नहीं ;

साथ रख
बचपन से पाला
बस उसी नौकर से डर ।

पार्क में
कटती सुबह
हमजोलियों के साथ में,
और दोपहरी
भी एलबम
संग पुरानी याद में ;

रात को
शंकित करे मन
गूँजता खुद का ही स्वर ।

दिन यहाँ होता
तो होती
रात है परदेस में,
प्यार-आदर-फ़िक्र
सिमटे
फ़ोन के संदेश में ;

कौन
इंटरनेट का सीखे
अब बुढ़ापे में हुनर ।

(15 जनवरी, 2015)

Tuesday, January 6, 2015

काश ! अंतस तक पहुंचती ......

ॐ
---
काश !
अंतस तक पहुँचती
उष्मा तेरी किरण की।

क्या फ़रक पड़ता
रहो तुम
उत्तरायण-दक्षिणायण,
हाथ हो रोजी
सुबह की,
रात को रोटी नारायण ;

कामना
हमको नहीं है
भीष्म से पावन मरण की।

तुम मकर में जा रहे हो
तो हुआ
उत्सव हमारा,
हम मकड़जालों में उलझे
ढूंढते
अपना किनारा ;

स्वयं सारे
वस्त्र खोकर
चाह रखते आवरण की।

देव तुम जानो
तुम्हारी गति-दिशा
आवागमन,
चाहते हम सिर्फ
अपनी मति मलिनता
का शमन ;

रुक सके तो
रोक दो गति
आचरण के ही क्षरण की।
- ओमप्रकाश तिवारी