चौदह रुपए वड़ा पाव के
चाय हो गई दस में,
कहां जिंदगी वश में !
राशनकार्ड कई रंगों के
उलझे ताने-बाने,
बैठ शिखर पर तय होते हैं
गुरबत के पैमाने ;
देश दिखे, जैसा दिखलाएं
आकाओं के चश्मे !
अनुदानों की सूची लंबी
हुआ खजाना खाली,
अर्थव्यवस्था के माहिर भी
बजा रहे हैं थाली ;
सौ दिन में सुख देनेवाली
धूल खा रही कस्में !
संसद में लड़ते-भिड़ते सब
पीछे मिले हुए हैं,
होंठ सभी के जनता के
प्रश्नों पर सिले हुए हैं ;
नारा, वोट, चुनाव आदि सब
लोकतंत्र की रस्में !
(25 अप्रैल, 2013)
Wednesday, April 24, 2013
Wednesday, April 10, 2013
बाबू जी की एक तर्जनी
बाबू जी की
एक तर्जनी
कितना बड़ा सहारा थी ।
मेले-ठेले में जाना हो
या हो नुक्कड़ का बाजार,
सड़क अमीनाबाद सरीखी
हो जाती थी क्षण में पार;
उंगली पकड़े रहते
जब तक,
अपनी तो पौ बारा थी ।
स्वर-व्यंजन पहचान कराना
या फिर गिनती और पहाड़े,
उंगली कभी रही न पीछे
गरमी पड़ती हो या जाड़े;
चूक पढ़ाई में
होती तो,
उंगली चढ़ता पारा थी ।
कम्प्यूटर का युग ना था वो
बाबू गणक कहां से लाएं,
उंगली पर ही कर लेते थे
दफ्तर की सारी गणनाएं;
उंगली
सिर्फ नहीं थी उंगली,
घर का वही गुजारा थी ।
(11 अप्रैल, 2013)
एक तर्जनी
कितना बड़ा सहारा थी ।
मेले-ठेले में जाना हो
या हो नुक्कड़ का बाजार,
सड़क अमीनाबाद सरीखी
हो जाती थी क्षण में पार;
उंगली पकड़े रहते
जब तक,
अपनी तो पौ बारा थी ।
स्वर-व्यंजन पहचान कराना
या फिर गिनती और पहाड़े,
उंगली कभी रही न पीछे
गरमी पड़ती हो या जाड़े;
चूक पढ़ाई में
होती तो,
उंगली चढ़ता पारा थी ।
कम्प्यूटर का युग ना था वो
बाबू गणक कहां से लाएं,
उंगली पर ही कर लेते थे
दफ्तर की सारी गणनाएं;
उंगली
सिर्फ नहीं थी उंगली,
घर का वही गुजारा थी ।
(11 अप्रैल, 2013)
Monday, April 8, 2013
ख़तरनाक हैं दुश्मन से
ख़तरनाक हैं
दुश्मन से, जो
अंदर-अंदर चाल रहे ।
सीमा पर के
तोप - मिसाइल, वाले
दुश्मन भले सही,
खंजर लेकर
वो हाथों में, मिलते हैं
ना गले सही ;
किंतु यहाँ तो
मुँह में मिसरी
लेकिन टेढी चाल रहे ।
हाथ मिलाना
गले लगाना
मीठी-मीठी बात करें,
सत्ता की
चाभी मिल जाए
तो सारे मिल घात करें;
फाड़ो गला
लगाओ नारे
उनकी मोटी खाल रहे ।
एक गया
दूजा आएगा
परिवर्तन की आस नहीं,
यहां कुएं में
भाँग मिली है
किसी को होश-हवास नहीं;
दशा-दिशा
कैसे सुधरेगी
जब उल्लू हर डाल रहे ।
( 09 अप्रैल, 2013)
दुश्मन से, जो
अंदर-अंदर चाल रहे ।
सीमा पर के
तोप - मिसाइल, वाले
दुश्मन भले सही,
खंजर लेकर
वो हाथों में, मिलते हैं
ना गले सही ;
किंतु यहाँ तो
मुँह में मिसरी
लेकिन टेढी चाल रहे ।
हाथ मिलाना
गले लगाना
मीठी-मीठी बात करें,
सत्ता की
चाभी मिल जाए
तो सारे मिल घात करें;
फाड़ो गला
लगाओ नारे
उनकी मोटी खाल रहे ।
एक गया
दूजा आएगा
परिवर्तन की आस नहीं,
यहां कुएं में
भाँग मिली है
किसी को होश-हवास नहीं;
दशा-दिशा
कैसे सुधरेगी
जब उल्लू हर डाल रहे ।
( 09 अप्रैल, 2013)
Wednesday, March 20, 2013
होलिके स्वागत तुम्हारा
होलिके
स्वागत तुम्हारा !
हिरण्यकश्यपु
की व्यवस्था
आज भी आबाद है,
हाथ जोड़े
आस में, प्रभु की
खड़ा प्रह्लाद है ;
आजमा लो
बल तुम्हारा !
अब तेरे
स्नान ख़ातिर
हर तरफ ही आग है,
किंतु
तेरी चूनरी में
एक छल का दाग है ;
सोच लो
आगत दुबारा !
आज भी
भाई-भतीजावाद
की भरमार है,
झूठ-सच में
एक चुनना
पर तेरा अधिकार है ;
क्या नहीं
काफी इशारा !
(21 मार्च, 2013)
स्वागत तुम्हारा !
हिरण्यकश्यपु
की व्यवस्था
आज भी आबाद है,
हाथ जोड़े
आस में, प्रभु की
खड़ा प्रह्लाद है ;
आजमा लो
बल तुम्हारा !
अब तेरे
स्नान ख़ातिर
हर तरफ ही आग है,
किंतु
तेरी चूनरी में
एक छल का दाग है ;
सोच लो
आगत दुबारा !
आज भी
भाई-भतीजावाद
की भरमार है,
झूठ-सच में
एक चुनना
पर तेरा अधिकार है ;
क्या नहीं
काफी इशारा !
(21 मार्च, 2013)
Monday, March 18, 2013
मत बनो चंदन
मत बनो चंदन
डसेंगे,
रोज विषधर
रात-दिन ।
जिधर देखो
वन ही वन है,
और नित
होता सघन है ;
पुष्प दिखते
खूबसूरत,
किंतु उनमें भी
चुभन है ।
सच कहो
तुम जी सकोगे ?
अरण्य का जीवन
कठिन !
मित्र
शीतलता तुम्हारी,
पड़ेगी
तुमपे ही भारी ;
आएंगी
संबंध बनकर,
कई तलवारें
दुधारी ।
ना बचा पाओगे
अपने लिए,
दिन का
एक छिन ।
लोग तो
आते रहेंगे,
तुमको
भरमाते रहेंगे ;
ले सुवासित
गंध तुमसे,
खुद को
महकाते रहेंगे ।
स्वयं को घिस
सजाओगे,
कब तलक
माथे मलिन !
( 19 मार्च, 2013)
डसेंगे,
रोज विषधर
रात-दिन ।
जिधर देखो
वन ही वन है,
और नित
होता सघन है ;
पुष्प दिखते
खूबसूरत,
किंतु उनमें भी
चुभन है ।
सच कहो
तुम जी सकोगे ?
अरण्य का जीवन
कठिन !
मित्र
शीतलता तुम्हारी,
पड़ेगी
तुमपे ही भारी ;
आएंगी
संबंध बनकर,
कई तलवारें
दुधारी ।
ना बचा पाओगे
अपने लिए,
दिन का
एक छिन ।
लोग तो
आते रहेंगे,
तुमको
भरमाते रहेंगे ;
ले सुवासित
गंध तुमसे,
खुद को
महकाते रहेंगे ।
स्वयं को घिस
सजाओगे,
कब तलक
माथे मलिन !
( 19 मार्च, 2013)
Friday, March 15, 2013
लेकिन पाया माँ का प्यार
चॉकलेट
कम खाई मैंने,
लेकिन पाया
माँ का प्यार ।
घर में रहनेवाली
माँ थीं,
घर ही था
उनका संसार,
हँसते-हँसते
दिनभर खटतीं
लगी गृहस्थी
कभी न भार
गरम पराठे
दूध-मलाई,
फिर भी नखरे
मेरे हजार ।
न आया का
दूध चुराना
न मेरे
हिस्से का खाना,
खुद ही
उबटन-तेल लगाकर
थपकी देकर
मुझे सुलाना
पल भर को भी
बाहर जाऊँ,
तो आने तक
तकतीं द्वार ।
नहीं बोर्डिंग का
सुख पाया
न पड़ोस में
समय बिताया,
क्रेच व बेबी सिटिंग
कहाँ थे
था माँ के
आँचल का साया
जन्मदिवस पर
केक न काटा,
किंतु गुलगुलों
की भरमार ।
( 16 मार्च, 2013)
कम खाई मैंने,
लेकिन पाया
माँ का प्यार ।
घर में रहनेवाली
माँ थीं,
घर ही था
उनका संसार,
हँसते-हँसते
दिनभर खटतीं
लगी गृहस्थी
कभी न भार
गरम पराठे
दूध-मलाई,
फिर भी नखरे
मेरे हजार ।
न आया का
दूध चुराना
न मेरे
हिस्से का खाना,
खुद ही
उबटन-तेल लगाकर
थपकी देकर
मुझे सुलाना
पल भर को भी
बाहर जाऊँ,
तो आने तक
तकतीं द्वार ।
नहीं बोर्डिंग का
सुख पाया
न पड़ोस में
समय बिताया,
क्रेच व बेबी सिटिंग
कहाँ थे
था माँ के
आँचल का साया
जन्मदिवस पर
केक न काटा,
किंतु गुलगुलों
की भरमार ।
( 16 मार्च, 2013)
Saturday, March 2, 2013
मध्य में हूँ, कहाँ जाऊँ
मध्य में हूँ
कहाँ जाऊँ ?
पेट खाली,
पर जुगाली
अब यही दस्तूर है,
दिन के संग-संग
रात पाली
किंतु दिल्ली दूर है ।
क्या निचोड़ूँ
क्या नहाऊँ
माह में बस
एक दिन के लिए
हम सुल्तान हैं,
शेष उन्तिस दिन तड़पते
जेब में
अरमान हैं ।
कैसे खाऊँ
क्या बचाऊँ ?
कंपनी के सेठ जी
हरदम लगे
नाराज हैं,
और घर पे
कामवाली बाइयों के
नाज हैं ।
किस तरह
सबको मनाऊँ ?
कर्ज लेकर
फ्लैट-बंगला, कर्ज से ही
कार है,
जो बचे वो
कर समझकर
काटती सरकार है ।
किस तरह
सपने सजाऊँ ?
( दो मार्च, 2013 - बजट के तीसरे दिन मध्य वर्ग की दशा का अनुभव करते हुए )
कहाँ जाऊँ ?
पेट खाली,
पर जुगाली
अब यही दस्तूर है,
दिन के संग-संग
रात पाली
किंतु दिल्ली दूर है ।
क्या निचोड़ूँ
क्या नहाऊँ
माह में बस
एक दिन के लिए
हम सुल्तान हैं,
शेष उन्तिस दिन तड़पते
जेब में
अरमान हैं ।
कैसे खाऊँ
क्या बचाऊँ ?
कंपनी के सेठ जी
हरदम लगे
नाराज हैं,
और घर पे
कामवाली बाइयों के
नाज हैं ।
किस तरह
सबको मनाऊँ ?
कर्ज लेकर
फ्लैट-बंगला, कर्ज से ही
कार है,
जो बचे वो
कर समझकर
काटती सरकार है ।
किस तरह
सपने सजाऊँ ?
( दो मार्च, 2013 - बजट के तीसरे दिन मध्य वर्ग की दशा का अनुभव करते हुए )
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