Friday, March 1, 2013

काश कफन में होती जेब

काश
कफन में होती
जेब !

मुश्किल से बनता है पैसा
करना पड़ता ऐसा-वैसा ,
मरता है जमीर घुटघुटकर
लगता लांछन कैसा-कैसा ;

इतनी कठिन
कमाई को भी,
देश समझता है
क्यूँ ऐब !

राजनीति बर्रों का छत्ता
यूँ ही न मिल जाती सत्ता,
जेल-बेल का लंबा चक्कर
उड़ता है गाँधी का पत्ता ;

फिर भी
मेरा काम आपको,
लगता है
सौ टका फरेब !

जो आया है उसको जाना
रह जाना है यहीं खजाना,
लिखवा कर लाया हर मानुष
अपने हिस्से का हर दाना ;

सपनों में
आती है फिर भी,
लाल-हरे
नोटों की खेप !

( एक मार्च, 2013)

Wednesday, February 27, 2013

अर्थ

अर्थ,
तुम्हारे
कितने अर्थ !

ताकि खर्च
चले सुनियोजित
बजट
बनाते हैं हर साल
बिना बजट के
घर में भी तो
चद्दर बन जाती
रूमाल

अर्थ जेब में
तो हम राजा
वरना सब कुछ
लगता व्यर्थ !

मिले
माह की
मेहनत पर जो
वेतन है
वह शब्द सटीक
लेने वाला
दान समझता
देने वाला
समझे भीख

इसी अर्थ
की ख़ातिर बाबू
हो जाते हैं
कई अनर्थ !

सुविधाशुल्क
कभी कहलाता
कभी कहा जाता
उत्कोच
भला नाम में
क्या रखा है
अपनी सुविधा
अपनी सोच

स्थायी कब रहा
अर्थ है
ये तो रहता
सदा तदर्थ !

( 28 फरवरी, 2013 - टेलीविजन पर राष्ट्रीय बजट की प्रस्तुति देखते हुए) 

Wednesday, February 20, 2013

मोक्ष-मुक्ति में बात कहाँ वह

मोक्ष-मुक्ति में बात कहाँ वह
जो नश्वर संसार में है

कौशल्या देवकी यशोदा
खेले गोद राम से योद्धा
वंचित रहकर इस ममता से
बना आज तक कौन पुरोधा

देवलोक में बात कहाँ वह
जो इक माँ के प्यार में है

मृग के लिए सिया का अड़ना
रुक्मिणि का राधा से लड़ना
पार्वती का शिव की खातिर
कई-कई जन्मों में पड़ना

उर्वशियों में बात कहाँ वह
जो प्रिय की मनुहार में है

खाना छीन के चना-चबेना
फिर दो लोक मित्र को देना
दुर्योधन के लिए कर्ण का
भाई के वध का व्रत लेना

इंद्रसभा में बात कहां जो
मित्रों से तकरार में है

( 21 फरवरी, 2013 - कुंभ, अयोध्या और काशी की यात्रा से लौटकर)

Monday, January 21, 2013

काहे का वैराग रे

दस प्रपंच में
उलझा है मन
काहे का वैराग रे !

हाथी घोड़े ऊँट सवारी
महँगी-महँगी मोटर गाड़ी
ठाट बाट पेशवा सरीखे
राजा लगते भगवाधारी

सिर्फ गेरुए
वस्त्र पहनना
कहलाता न त्याग रे !

चेले-चापड़ गहमागहमी
परमपूज्य वाली खुशफहमी
गांचा चिलम चढ़ाकर करना
अपने तन से भी बेरहमी

तुझ पे नहीं
सुहाता बिल्कुल
संन्यासी ये दाग  रे !

भस्म-भभूती अनी-अखाड़े
प्रतिद्वंद्वी आपस में सारे
भक्त मंडली क्या सीखेगी
सोचो ठंडे मन से प्यारे

सोई सृष्टि
जगानेवाले
पहले खुद तो जाग रे !

(21 जनवरी, 2013 - पूरी श्रद्धा के साथ कुंभ को समर्पित) 

Saturday, January 19, 2013

राजा नंगा है

राजा जी को 
कौन बताए 
राजा नंगा है ।

आँखों पर मोटी सी पट्टी
मुँह में दही जमा
झूठी जयकारों में उसका
मन भी खूब रमा 

जिस नाले वह
डुबकी मारे 
वो ही गंगा है ।

रुचती हैं राजा के मन को
बस झूठी तारीफें
उसको कोसा करें बला से
आगे की तारीखें

उसके राजकाज में
सच कहना
बस पंगा है 

पीढ़ी दर पीढ़ी उसने है
पाया या दर्जा 
ताका करती है उसका मुँह
पढ़ी-लिखी परजा

वह मुस्काए
मुल्क समझ लो
बिल्कुल चंगा है 

- ओमप्रकाश तिवारी


( 20 जनवरी, 2013 - आदरणीय राहुल गांधी की प्रोन्नति से प्रेरणा पाकर )  

Friday, January 11, 2013

बड़ा आदमी

बेचारा वह
बड़ा आदमी

उठने में सूरज से हारा
फिर भी हैंगओवर का मारा
कई किलोमीटर की जॉगिंग
लेकिन चढ़ा न तन का पारा

पकड़ ट्रेडमिल
खड़ा आदमी

पाले है सत्तर बीमारी
बीपी-शुगर पड़ रहे भारी
हलवा-पूड़ी व षट्व्यंजन
छोड़ खाय उबली तरकारी

जीवन से भी
डरा आदमी

इनकम टैक्स वैट का चक्कर
कस्टम वालों से भी टक्कर
काले को सफेद करने में
रोज चूर हो जाना थक कर

दस पचड़ों में
पड़ा आदमी

बीवी की लंबी फरमाइश
नापसंद बेटी की च्वाइस
जूते पर कब्जा कर बैठे
बेटे से भी जोर-अजमाइश

बस कॉलर का
कड़ा आदमी

(12 जनवरी, 2013)

यूँ ही नहीं राम जा डूबे

यूँ ही नहीं
राम जा डूबे
सरजू जी के घाट !

दिन भर
राजपाट की खिटखिट
जनता के परवाने
मातहतों का
कामचोरापा, फिर
धोबी के ताने

लोग समझते
राजा जी तो
भोग रहे हैं ठाट !

था आसान कहां
त्रेता में भी
तब राज चलाना
शेर और बकरी
को पानी
एक घाट पिलवाना

ऊपर से
भरमाने वाले
कितने चारण-भाट !

हारे-थके
महल में पहुंचे
तो सूना संसार
सीता की
सोने की मूरत
दे सकती न प्यार

ऐसे में
क्षय होना ही था
वह व्यक्तित्व विराट !

(11 जनवरी, 2013)