Thursday, April 9, 2026

बस कथा विद्धंस की

बस कथा विद्ध्वंस की

****************
लोग लिखने पर तुले हैं
बस कथा
विद्ध्वंस की।

कौन इस कलिकाल में
निकले सृजन का
गीत गाने,
चल पड़े कुछ लोग अब तो
‘सभ्यता’
को ही मिटाने ;

फिक्र हम करते नहीं अब
तनिक आगत
वंश की।

किस हवा में सांस लें अब
हर तरफ
बारूद है,
मौत की आहट
कदम दर कदम
पर मौजूद है ;

सृष्टि चट कर
गिद्ध भी अब
चाल चलता हंस की।

बाहुबल भारी पड़े
हर ओर
सह अस्तित्व पर,
विजय ध्वज
फहरा रहे
इंसानियत की मृत्यु पर ;

गूंजती हैं अट्ठहासें
आज
रावण-कंस की।

- ओमप्रकाश तिवारी

Friday, August 8, 2025

धरा बन जाती 'धराली'


खोल देते जब अचानक
शिव जटा से गंग धारा,
धरा बन जाती 'धराली'
है न दिखता कुछ सहारा।

दृश्य यह दिखता है प्रतिदिन
हम प्रकृति की चीर खींचें,
देखकर भी साफ दुर्गति,
हम पड़े हैं आंख मींचे ;

जाएगी किस ओर नदिया
घेर हम बैठे किनारा। 

काट कर वृक्षों को हमने ही
किया पर्वत को नंगा,
कब तलक आंचल को फटते
मूक बन देखेगी गंगा ;

शंख यह प्रतिशोध का
फूंका गया कुदरत के द्वारा।

था बुजुर्गों ने सिखाया
प्रकृति की हम करें पूजा,
किंतु हमने आधुनिक बन
चुन लिया है मार्ग दूजा ;

जान लो इस राह पर
चलकर न होना है गुजारा।

- ओमप्रकाश तिवारी

08 अगस्त, 2025

Tuesday, July 15, 2025

हे भगीरथ माफ करना !

ॐ 
.....
हे भगीरथ माफ करना।

जानता हूँ 
आप ही गंगा को 
धरती पर उतारे,
स्वयं के संग 
अनगिनत पुरखों को
हम सबके भी तारे,
किंतु अब तो
आग देने की भी
फुर्सत ना बची है,
कौन गंगा तीर जाकर
अस्थियां
पुरखों की वारे।

इसलिए तो
पड़ रहा अब
स्वयं गंगा को ही मरना।

सच कहूं तो
आज तक वह 
तप तुम्हारा याद है,
गूँजती कानों में
शिव से आपकी
फरियाद है,
याद है वह गूँजती
गोमुख से
हर हर हर ध्वनी,
और फिर
सुजलाम होती
यह धरा भी याद है।

किंतु नाले 
गिर रहे गंगा में बनकर
आज झरना।

तीर पर 
गंगा के दादी माँ
ने जा पियरी चढ़ाई,
लोकगीतों में सुनी
गंगा की 
हरदम ही बड़ाई ;
अब न दादी हैं
न है वह लोक
उनका ही रचा,
प्लास्टिक की थैलियां
गंगा पे करतीं
अब चढ़ाई।

भूल बैठा आज तो
इंसान पापों
से भी डरना।

- ओमप्रकाश तिवारी
00:52/ 08 जुलाई 2025

Sunday, August 13, 2023

अपनी माटी


चमक-दमक में
महानगर के
याद आ रही अपनी माटी।

दरक-दरक कर
बरखा - दर - बरखा
धसकीं घर की दीवारें,

जब शहरों में
संकट छाया
वे दीवारें, रोज पुकारें ;

याद आ रही
बिकी खतौनी
थी जो भाई के संग बाँटी।

लॉक हुआ जब
महानगर, अरु
हाथ लगी नौकरिया बिछड़ी,

नगर निगम
अहसान जताकर
बाँट रहा है सूखी खिचड़ी ;

हाथ-पाँव यदि
वहाँ चलाते
अपनी माटी हमें खिलाती।

भले दिनों में
बहुत भले हैं
नगर सभी को खूब लुभाएँ,

लेकिन यह भी
परम सत्य है
शहरों की अपनी सीमाएं ;

पुनः आसरा
देगी अब तो
टूटी - दरकी माँ की छाती
 
- ओमप्रकाश तिवारी
(19 मई, 2020)

(मई का तीसरा सप्ताह शुरू होते-होते मुंबई में मेरे कई साथी और जानने वाले अस्पताल पहुँच चुके थे। एक-दो निकट परिचित विद्युत शवदाहगृह की भेंट चढ़ चुके हैं। अब बिल्डिंगों में रहने वाले कई रिश्तेदारों और मित्रों को भी अपने गाँव की याद सताने लगी है। तब फूटीं ये पंक्तियां )


स्वेद की गंगा

हाइवे पर 

बह रही है

स्वेद की गंगा ।

दिख रहे हैं
काफिले दर काफिले
हर ओर,
रात लंबी है बहुत
दिखती न
इसकी भोर ;

राह आधी 
भी हुई ना
भर गई जंघा ।

आज 
मेहनतकश श्रमिक गण
बन गए फुटबॉल,
जा रहे चलते
न कोई
पूछता है हाल ;

हर व्यवस्थादार
अब तो
दिख रहा नंगा।

गिर चुकीं
लाशें कई
कोई चले भूखा,
है सुरक्षित
गाँव अपना
रोटला रूखा ;

पुनः लौटेंगे
रहा यदि
सब भला-चंगा।

- ओमप्रकाश तिवारी
(14 मई, 2020)

(मई का प्रथम सप्ताह बीतते-बीतते महानगरों से श्रमिकों के पलायन की खबरें आने लगी थीं। मुंबई - नासिक हाइवे पैदल चलते श्रमिकों से पट गया था। तब 14 मई को लिखा गया यह नवगीत )


मेरे दिल का हाल


तुम्हें मुबारक
राशन-पानी
पका पकाया माल,

तुम क्या जानो
कोठी वालों
मेरे दिल का हाल !

हम अटके हैं
महानगर में
घर में सब परिवार,
मात-पिता का 
पूत अकेला
मैं ही जिम्मेदार ;

होगा कौन सहाय
यहाँ पर
यदि आ जाए काल !

नरक सरीखी
इक खोली में
बारह जन का वास,
बाहर निकलो
डंडे खाओ
घर में जिंदा लाश ;

फारिग होना भी
बस्ती में
अब तो हुआ मुहाल !

महुआ चूने लगा
गांव में
आने लगे टिकोर,
भूखे-प्यासे
हम परदेसी
बैठे हैं इस ओर ;

पछुआ में पक
बाट जोहती
है गेहूँ की बाल !

- ओमप्रकाश तिवारी
(14 अप्रैल, 2020)

(14 अप्रैल तक समाज के एक वर्ग द्वारा यह तर्क दिए जाने लगे थे कि महानगरों में अटके श्रमिकों को भरपूर भोजन मुहैया कराया जा रहा है। फिर वे क्यों अपने घर जाने को उतावले हो रहे हैं ! तब श्रमिकों की मनःस्थिति को दर्शाते इस नवगीत की रचना होती है)


लॉक डाउन

माना कि 

मन में कुछ डर है,
लेकिन धरती - आसमान में
दिखता कुछ तो
अति सुंदर है।

सुबह-सुबह 
कोयल की कू - कू
महानगर में अचरज सी थी,
सच कहता हूँ
बालकनी में
आकर गौरैया बैठी थी;

बीचोबीच 
शहर में जैसे
मेरे बचपन वाला घर है।

नदिया का जल
साफ हो गया
वायु प्रदूषण हाफ हो गया,
दुर्घटना में
मरने वालों 
का भी बेहतर ग्राफ़ हो गया;

स्याह दिखाई
देता था जो,
दिखता वह नीला अम्बर है।

सुबह रही ना
हड़बड़ वाली,
चलते-चलते वाली थाली,
बैठ पिता-माता
के संग अब
पीते गरम चाय की प्याली;

बेटे के घर में
रहने से,
भ्रम होता वह गया सुधर है।

- ओमप्रकाश तिवारी
( 6 अप्रैल, 2020 )

(लॉक डाउन के 12 दिन गुजरते ही जालंधर से हिमालय पर्वत दिखाई देने, दिल्ली में यमुना के साफ हो जाने और मुंबई में तेंदुए के सड़क पर घूमने की खबरें आने लगीं, तो 6 अप्रैल को यह नवगीत बना था। )

सन्नाटा

 

महानगर के
गलियारों में 
मरघट जैसा सन्नाटा है।

दूर-दूर से
छिटके-छिटके
लोग कर रहे हैं गुडमॉर्निंग,
मिलना-जुलना
सख्त मना है
जारी है सरकारी वार्निंग;

एक अदृश्य
अनोखे भय ने
जन को जन से ही बाँटा है।

लोग कह रहे
बीमारी है
जिससे कायनात हारी है,
पीएम से सीएम तक
सबके 
चेहरों पर दहशत तारी है;

प्रगतिशीलता 
के गालों पर 
यह तो कुदरत का चाँटा है।

एक मुनादी
पर थम बैठे
सारी दुनिया के कल-पुर्जे,
शायद मानव
चुका रहा है
आज प्रकृति के सारे कर्जे;

गीला कंगाली में
दिखता
महाशक्तियों का आटा है।

- ओमप्रकाश तिवारी
(30 मार्च, 2020)

(30 मार्च को लॉक डाउन का प्रथम चरण शुरू हुए एक सप्ताह ही हुए थे, और मुंबई सायँ-सायँ कर रही थी। तब यह नवगीत अपने आप बन पड़ा था)

Wednesday, March 22, 2023

व्यथा किसान की



......
समझें एसी कमरे वाले
कैसे व्यथा किसान की !

कर्ज काढ़ कर बोया-जोता
फसलों की उम्मीद से,
पूस-माघ में खेत रखाया
जाग-जाग कर नींद से;

क्रुद्ध दृष्टि पड़ गई अंत में
विधि के क्रूर विधान की।

हरा-भरा था फसलों जैसा
कल तक मन परिवार का,
एक रात में दृश्य दिख रहा
देखो हाहाकार का ;

बेमौसम बरसात ले गई
फसलें सब अरमान की।

वादे तो सारे सरकारी
लगते हैं अब झूठ के,
बीमा-राहत चुटकी-चुटकी
जीरा मुँह में ऊँट के।

राहत नहीं, चाहिए हमको
रोटी बस सम्मान की।

- ओमप्रकाश तिवारी
22 मार्च, 2023
विक्रम संवत 2080, गुड़ी पड़वा

Wednesday, December 18, 2019

बिना तपे

ऊँ
.....
बिना तपे
कुछ ठोकर खाए
कहाँ सफल इंसान बना है !
सोने का चम्मच
ले मुँह में
जन्में राम अयोध्यावासी,
गाथा उनकी
गाई जाती
जो प्रभु भटके हो वनवासी ;
बिना लड़े
जग की कुनीति से
कौन, कहाँ भगवान बना है !
देवालय में
सुंदर प्रतिमा
बड़े भाव से पूजी जाती,
धूप-दीप अरु
पुष्प चढ़ाकर
दुनिया उसको शीश नवाती ;
संगतराश की
चोट सहे बिन
कहाँ पूज्य पाषाण बना है !
याद करो
सागर मंथन को
अमृत घट थे देव ले उड़े,
एक बूँद
पाने की खातिर
अपनी शक पर दैत्य भी लड़े
बिना गरल को
गले उतारे
कौन भला गणनाथ बना है !
- ओमप्रकाश तिवारी
(19 दिसंबर, 2019)

Tuesday, December 11, 2018

इस दिन खातिर !

ढपली-थाली, जो भी पाया
खूब बजाया, नाचा-गाया
इस दिन खातिर !

जन्म दिया, कर पालन-पोषण
माँ दिखती बदहाल,
तुम समर्थ हो गए, तो हुई
माँ जी का जंजाल !
शिखर छुओ तुम, रहा हमेशा
ये उसका आशीष,
शिखरपुरुष हो गए आप, और
माँ घर में कंकाल  !!

निराजली व्रत सकठ-अष्टमी,
तुलसी को जल - रोज चढ़ाया
इस दिन खातिर !

दिया ननद को नेग, और
दी हिजड़े को बख्शीश,
दूर-दूर तक देवालय में
जाय नवाया शीश ;
हुई मुहल्ले भर की दावत
लड्डू बँटे हजार,
खुशियाली में कन्याओं को
बाँट दिए दस-बीस।

खुद गीले में सो करके भी
सूखे में था तुझे सुलाया
इस दिन खातिर !

तुझ जैसी ही रही गर्भ में
पर था दर्जा दोयम,
हाजिर रहती हर पुकार पर
करें इशारा जो हम ;
रखी हमेशा तेरी खातिर
एक मिठाई ज्यादा,
फिर भी चुप्पी साध रह गई
बहन तुम्हारी हरदम।

ऐसी बेटी विदा हो गई
लेकिन रक्खी तुझसे माया
इस दिन खातिर !
- ओमप्रकाश तिवारी
(11 दिसंबर, 2018) 

बताओ बाबू जी

पाँच बरस पहले तो
तुम थे, हम जैसे कंगाल,
शपथपत्र में नए, हो गए
कैसे मालामाल ?
बताओ बाबू जी !

किया कौन उद्योग, बताओ
किया कौन व्यापार,
किस विधि आई इतनी दौलत
आखिर छप्पर फाड़ ;
बताओ बाबू जी !

विरोधियों से हमें लड़ाया
फूटे कई कपार,
कैसे संसद में जाते ही
डाल दिए हथियार ;
बताओ बाबू जी !

डगर-डगर पैदल घूमे, जब
आए पहली बार,
अब पीछे-पीछे चलती हैं
कैसे दस-दस कार ;
बताओ बाबू जी !

क्षेत्र तुम्हारा जस का तस है
तनिक न बदला हाल
सिर्फ तुम्हारी बढ़ी तोंद पर
उठते कई सवाल ;
बताओ बाबू जी !

- ओमप्रकाश तिवारी
(09 दिसंबर, 2018) 

सपनों की दुनिया

अपने सपनों की
दुनिया इतनी छोटी है,
सिर पर छत एक, और
दाल-भात-रोटी है।

बस इतना चाह रहे
मेहनत का मोल मिले,
बच्चों का मुरझाया चेहरा
ज्यों फूल खिले ;

किंतु आस इतनी भी
पूर्ण नहीं होती है।

तुम आकर पांच बरस
में देते आश्वासन,
पर जुमला बन जाता
जाते ही वह भाषण ;

जाने क्यों बंधु लगे
नीयत ही खोटी है।

हमने कब चाँद और
तारों की माँग करी,
कब छप्पन भोग और
कब माँगा सूप-करी ;

वादों में तुमने ही
बाँटी तो बोटी है।
- ओमप्रकाश तिवारी
(08 दिसंबर, 2018)

नया हिंदुस्तान

यह सदी इक्कीसवीं का
नया हिंदुस्तान है।

दो में गेहूँ
तीन में चावल
हुआ इफरात है,
और
मनरेगा बदौलत
शाम भी 'आबाद' है ;

अब खुदा के ओहदे पर
जमा ग्राम प्रधान है।

नौजवाँ को चाहिए
बस नौकरी
सरकार की,
फिक्र
वेतन से अधिक है
ऊपरी दो-चार की ;

घाघ से बिल्कुल उलट
अब सोचता इंसान है।

है महानगरों में
बिगड़ी
और भी दिखती दशा,
घुन बना
है खा रहा अब
नौनिहालों को नशा ;

ये चलन ही देश का
सबसे बड़ा नुकसान है।
- ओमप्रकाश तिवारी
(06 दिसंबर, 2018)

Thursday, December 6, 2018

बॉस

तुम सही हो
ये सही है,
किंतु मेरी बात मानो।

फायदा क्या 
इस तरह 
तनकर खड़े रहकर भला,
काटने पर 
क्यों तुले हो
स्वयं बच्चों का गला ;

बॉस वो है
नाकि तुम हो,
बस अटल यह सत्य जानो।

रीढ़ की हड्डी
झुका लो
और घुटने टेक दो,
काम आएगा
न एफडी
अहं का, अब फेंक दो ;

नौकरी है दोस्त 
समझो,
और मत अब रार ठानो। 

खुश रहोगे यार
बस यह 
सूत्र अपनाओ जरा,
कल सुबह 
लेकर मिठाई 
घर पे दे आओ जरा ;

रोज चखकर 
टिफ़िन उसका,
स्वाद सब्जी का बखानो। 

- ओमप्रकाश तिवारी
(6 दिसंबर, 2018)

ड्रामा

इस ड्रामे का
प्रथम नियम है,
इसमें पर्दा नहीं खुलेगा।
दर्शकगण
नाचें-गाएंगे
चिल्लाएंगे-झल्लाएंगे,
ज्यादा से ज्यादा
क्या होगा ?
कुर्सी पर से उठ जाएंगे !
किंतु देखना
नाट्यगार से
कोई बंदा नहीं हिलेगा।
रोचकता से
भरा हुआ है,
दर्शकमंडल डरा हुआ है,
चरमबिंदु पर
पता चल रहा
सूत्रधार तो मरा हुआ है ;
जिसको नायक
मान लिया वह,
सबको छाती ठोंक छलेगा।
जिस पर्दे को
देख रहे हो,
उसके पीछे ही है ड्रामा,
कोई है
'कुलीन' अभिमन्यु
तो कोई है शकुनी मामा ;
'लोक' द्रौपदी को
इस युग में
सखा कृष्ण अब नहीं मिलेगा।
- ओमप्रकाश तिवारी
( 6 दिसंबर, 2018)

Sunday, December 2, 2018

बड़े लोग

बड़े लोग हैं
बड़ा अलहदा
उनके घर का तौर-तरीका।
हर कमरे में
इक टीवी है
देखे, जिसको जो पसंद हो,
कोई न खटकाए
साँकल
चार दिनों से भले बंद हो ;
जाना बेटे के
कमरे में
माना जाता नहीं सलीका।
इंतजार
पूरे कुनबे का
करती रहती डाइनिंग टेबल,
मिलते हैं
बस मुँह लटकाए
उस पर दादी-दादा केवल ;
त्यौहारों
में भी रह जाता
स्वाद व्यंजनों का है फीका।
शाम ढले
बेटा जाता है
बेटी लौटे रात गए,
सब अपनी
मर्जी के मालिक
किसको क्या माँ-बाप कहे ;
प्रगतिशील
दुनिया है ये ही
कौन करे इस पर अब टीका।
- ओमप्रकाश तिवारी
(02 दिसंबर, 2018)

Tuesday, October 16, 2018

माफ करना कौस्तुभ

.....
माफ करना कौस्तुभ
जब दुश्मनों से तुम लड़े थे !

काम में उलझा रहा मैं
व्यस्त था वह दिन हमारा,
था जुलूसों का बवंडर
गगनभेदी एक नारा;
गोलियों से क्रूर अरि की
लाल जब तुम हो रहे थे,
'लाल' हमने भी किया था
उस दिवस ये शहर सारा।

जानते हो मित्र ! हम उस रोज
आरक्षण की खातिर,
टेंट में तपती दुपहरी
एक अनशन में पड़े थे !

जल रहा था शहर, मानो
हो धरा अंगार पर,
है कुठाराघात होता
आजकल 'अधिकार' पर ;
क्या पता तुम सैनिकों को
देश के हालात का,
कट रही है जिंदगी
यूँ जान लो, बस धार पर।

चार ही दिन तो हुए
यूनिवर्सिटी के प्रांगण में
'जंग-ए-आजादी' का परचम
लेके हम भी तो खड़े थे !

मर गए जिस देश की खातिर
भगत-आजाद-बिस्मिल,
जोड़ने की फिक्र में घुलते रहे
सरदार तिल-तिल ;
मित्र, ऊपर से दिखाई 
दे रहा है एक लेकिन,
जुड़ न पाया आज तक भी
सैकड़ों टुकड़ों बँटा दिल ।

फिक्र जब तुम कर रहे थे
शत्रु के आघात की,
जात की चिंता लिए हम
आंदोलन पर अड़े थे।

  • ओमप्रकाश तिवारी
(15 अक्टूबर, 2018)



(समुद्र मंथन के दौरान निकला 5वां रत्न था कौस्तुभ मणि। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते थे। देश की ऐसी ही अमूल्य मणि थे मुंबई के निकट मीरारोड निवासी मेजर कौस्तुभ राणे, जो अगस्त, 2018 में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए। नवगीत में उनके नाम का उपयोग एक प्रतीक के तौर पर सीमा पर तैनात और निरंतर शहीद हो रहे वीर सैनिकों के रूप में किया गया है। )

गाँधी

ऊँ
.....
याद तो हर मोड़ पर
तुम आज भी
आते हो गाँधी।

याद है 'हे राम' कहकर
अचानक
दुनिया से जाना,
प्रार्थना में 'रामधुन' ही
हर सुबह
औ शाम गाना ;

नाम यह लेने पे उठती
आज तो 
हर ओर आँधी।

सत्य के प्रति
था अटल
मासूम सा आग्रह तुम्हारा,
था इसी हथियार से
तुमने 
फिरंगी को पछाड़ा ;

आज कर्कश
लग रही है
सत्य की वो ही मुनादी।

सूत-चरखा
औ रुई संग
नाचती हाथों से तकली,
अब विदेशी ब्रांड पर
फैली हुई
मुस्कान नकली ;

आज 
सत्ता की गली में
गालियाँ खाती है खादी।

लीडरों की फौज
मरती
दिख रही है वोट पर,
और बापू 
तुम बचे हो
आज केवल नोट पर ;

है उसी तस्वीर का
अब हो चुका
यह देश आदी।

- ओमप्रकाश तिवारी

(बापू की 149वीं जयंती 2 अक्टूबर, 2018 को रचा गया नवगीत)

Saturday, September 15, 2018

कुछ दिनों पहले

ऊँ
.....
कुछ दिनों पहले
अभी बस
कुछ दिनों पहले

पान की दूकान पर
कुछ चल रही थी बात,
था विषय यूँ ही कोई
बस आज के हालात ;
कट लिए मुझसे हमारे
रोज के साथी,
जान बैठे जब अचानक
वो हमारी जात !

कुछ दिनों पहले
अभी बस
कुछ दिनों पहले

जश्न के माहौल में था
वह बगल का घर,
उस पड़ोसी को मिला था
कोर्ट का फेवर ;
हम जिन्हें समझा किये
हैं सिर्फ 'दो लड़के'
था उन्हीं में
एक बेगम-दूसरा शौहर !

कुछ दिनों पहले
अभी बस
कुछ दिनों पहले
गार्डेन में रोज मिलकर
मुस्कुराता था,
हाय-हैल्लो बोलकर बस
गुजर जाता था ;
खाल में खरगोश की
निकला लकड़बग्घा,
जो किसी कॉलेज में
'कुछ तो' पढ़ाता था !

- ओमप्रकाश तिवारी
(14 सितंबर, 2018)