बस कथा विद्ध्वंस की
****************लोग लिखने पर तुले हैं
बस कथा
विद्ध्वंस की।
कौन इस कलिकाल में
निकले सृजन का
गीत गाने,
चल पड़े कुछ लोग अब तो
‘सभ्यता’
को ही मिटाने ;
फिक्र हम करते नहीं अब
तनिक आगत
वंश की।
किस हवा में सांस लें अब
हर तरफ
बारूद है,
मौत की आहट
कदम दर कदम
पर मौजूद है ;
सृष्टि चट कर
गिद्ध भी अब
चाल चलता हंस की।
बाहुबल भारी पड़े
हर ओर
सह अस्तित्व पर,
विजय ध्वज
फहरा रहे
इंसानियत की मृत्यु पर ;
गूंजती हैं अट्ठहासें
आज
रावण-कंस की।
- ओमप्रकाश तिवारी